Friday, 17 August 2007

यहां काम करना मना है ।

दोस्तों, अभी अख़बारो से खबर मिली कि दक्षिण बस्तर के सुदूर गांव को स्वास्थ्य सेवा पंहुचने वाली विदेशी संस्था मेडिकल सेंस फ़्रंटियर को शासन ने काम करने से रोक दिया । इस संस्था पर नक्सलीओं का इलाज़ करने का आरोप लगा गया है । कहा गया है कि संस्था को सिर्फ़ केम्प मे कार्य करने के लिये कहा गया था लेकिन यह गांव मे जाकर लोगों का इलाज कर रही है । इन गांव मे नक्सली रहते है । जब सरकार को यह मालुम है कि यहां नक्सली है तो वहां पुलिस को भेजकर मार क्यों नही देती । कुछ गांवों मे इनकी पंहुच थी जहां सरकार के लोग नही पंहुच सकते है या जाना नही चाहते । दक्षिण बस्तर में अब ये स्वास्थ्य सुविधा भी गरीब आदिवासीओ से छिन गयी ऊपर से एक भली संस्था को बदनामी भी साथ दे दी । भई आखिर बस्तर है बस्तर ! जो इस संस्था ने यहां काम करने की जो गलत आद्त जो डाली थी । यहां काम करना मना है भई ! खैर जो भी हो यह संस्था नोबल पुरुस्कार प्राप्त है तथा हमारे देश ने भी इंदिरा गांधी पुरुस्कार से सम्मानित किया है । संस्था का काम है मुश्बित में फ़से लोगों को इलाज उपलब्ध करवाना । देश मे जम्मु कशमीर, मणिपुर, मुम्बई, तमिलनाडू में इस संस्था का काम करती है ।

3 comments:

Sanjeet Tripathi said...

यह एक अच्छी बात है कि आपने खास बस्तर पर ब्लॉग़ शुरु किया है क्योंकि बस्तर की आज जो हालत है अगर बता सके तो इसे वही सच बता पाएगा जो खुद आज की तारीख़ में बस्तर में हो!!

स्वागत है आपका हिन्दी चिट्ठाजगत में।
शुभकामनाएं

बस्तर से कोसों दूर रहता हूं मैं पर फ़िर भी बस्तर से जुड़ा कुछ लिखने की कोशिश की थी आप चाहें तो एक नज़र डाल सकते हैं।

रंजन said...

बहुत अच्छा अंशुल!! समाजिक मुद्दो पर अपनी कलम चलाते रहिये.. हमे बस्तर के हालातो से रुबरु करते रहिये

Piyush said...

"इन गांव मे नक्सली रहते है । जब सरकार को यह मालुम है कि यहां नक्सली है तो वहां पुलिस को भेजकर मार क्यों नही देती ।"

In my opinion it's not right to say there are naxals in village unless you have a sharp way to distinguish between villagers and naxals

Aashcharya hota hai ki koi kanun yeh bhi kahata hai ki naxaliyon ko chikitsa ka adhikar nahi

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